#Hindi #Satire #KarnatakaElections Ashoka in Karnataka - कर्नाटक में अशोक
कहते हैं महान लोग मरणोपरांत धरती को अनिवार्य रूप से नहीं त्यागते, सिर्फ़ जन्म जन्मातर का भय त्याग कर तीनों लोकों में आत्मा स्वरूप विचरण करते हैं। यहाँ हम उनकी बात कर रहे हैं जो सार्वभौमिक रूप से महान हैं, वरना तो स्वतंत्रता के बाद महान लोगों की संख्या में ग़ज़ब वृद्धि हुई है।
हम जिस श्रेणी के व्यक्तियों की बात करते हैं वह आर्गेनिक रूप से महानता में स्थापित हुए हैं, जैसे अशोक, चंद्रगुप्त, विक्रमादित्य, अलक्षेंद्र । चमचों के द्वारा इस वर्ग में धकेले गए व्यक्तियों को हम इसमें नहीं ले रहे है।
चमचों की मानें तो चाणक्य से चरणसिंह, अलाउद्दीन ख़िलजी से अकबरुद्दीन ओवैसी, राहुल से मुहम्मद शाह रंगीला तक के माथे पर महानता का स्टिकर चिपका है।
इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों की माने तो मुग़ल क़ालीन चिरकुट किराना व्यापारी की क़ब्र भी महानता ओढ़े है।
जिसकी क़ब्र है वह भी यदि पुनर्जीवित हो जाए तो हबीब साहब की अपनी क़ब्र के लिए चिंता देख लज्जावश यह कहते हुए दोबारा मर जाए कि महान तो हमें कभी मुन्नी बेगम ने भी नहीं माना जब उसके मुजरे में हमने दो सौ अशर्फ़ियाँ लुटा कर घर में बेगम के बेलन खाए थे।
बहरहाल, हुआ यह कि अशोक महान आत्मा स्वरूप आधुनिक कर्नाटक से पिछले दिनों गुज़र रहे थे। राज्य में विचित्र सा परिवर्तन दिखाई देता था। बरमूडा पहनने वाले नागरिक कुर्ता पाजामे में आ गए थे, बनियान पहनने वाले,सनीचर सरीखे लोग बनियान में रेनाल्ड्स की कलम खोंस कर बुद्धिजीवी हो गए।
सम्राट अशोक को ऐसी जीवन्तता वहाँ कई बरसो में पहले नहीं दिखी थी। नगरजन पोस्टर लगा और उखाड़ रहे थे। रोमांचक वातावरण था, कर्नाटक में चुनाव था। सम्राट ने शरीर धारण कर के चुनाव का आनंद लेने की विचार किया और प्रकट हो गए।
इंदिरा कैंटीन पर काँख में पोस्टर दबाए, सांभर मिश्रित भात के गोले मुँह की तरफ़ उछालते और निपुणता से कैच करते व्यक्ति से अशोक बोले-

मित्र, यह शोर कैसा? यह कैसा कुकुरहाव है?

उत्तर मिला- कर्नाटक में चुनाव है।
अशोक - यह चुनाव क्या होता है?

मित्र बोले- यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें अपने शोषण के लिए लिए शोषित व्यक्ति अपने शोषण के लिए नई व्यवस्था का चयन कर सकता है जो उसका नए, रुचिकर तरीक़ों से शोषण कर सके। इससे शोषण निरंतर चलता रहता है पर बोरियत मिट जाती है।
अशोक बोले- इस व्यवस्था को क्या कहते हैं?

मित्र बोले- यह लोकतंत्र है। जो राजा बनना चाहता है वह जनता को सभा कर के यह बतलाता है कि वह जनता के क्या करेगा, और जनता मत देती है। जिसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, वह पाँच वर्ष के लिए शासक नियुक्त होता है।
जनता जानती है कि करेगा यह भी कुछ नहीं पर यह अवसर पंचवर्षीय सम्राटों का मज़ा लेने का है। प्रजा अपने लिए टीवी, फ़ोन, लैपटॉप की व्यवस्था करती है और महज़ मज़े के लिए वोट कर देती है। सत्ता में आने वाला, तीन वर्ष पिछली सरकार को कोसता है, दो वर्ष पुन: सत्ता में आने का जुगाड़ बिठाता है।
सम्राट बोले- तो क्या सत्ता बदलने से जनता के जीवन में परिवर्तन आता है?

मित्र ने अशोक को घूर कर देखा, भाना कि यह विचित्र वस्त्र धारण किये यह व्यक्ति मूर्खता और भोलेपन की ड्योढ़ी पर खड़ा है और उनके मज़े नहीं ले रहा है।
अशोक बोले: तो क्या तलवार के बल पर शासन प्राप्ति की परंपरा समाप्त हो गई? क्या मेरा अहिंसा का संदेश अब भी राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त कर रहा है?
मित्र को फिर संदेह हुआ कि कहीं यह मूर्ख का रूप धर कर, ड्रामे के कपड़े पहन मेरे मज़े तो नहीं ले रहा।
एक बार सोचा इसका ट्विटर हैंडल पूछ कर उस पर नीली टिक्की चेक करूँ काहे कि बात तो बुद्धिजीवी वाली कर रहा है। परंतु सम्राट के मुख पर भोलापन छाया था। वह अवश्य मज़ाक़ नहीं कर रहे थे। प्रश्न गंभीर था और गंभीर उत्तर का अधिकारी था।
मित्र बोले- सत्ता परिवर्तन राजतंत्र में हो या लोकतंत्र में, हिंसा के मार्ग से ही होता है।
लोकतंत्र में हिंसा पर प्रशासन आँखें मूँद लेता है, पत्रकार अभिनेताओं के पुत्रों के लंगोट पर लेख लिखने लगते हैं, व्हाट्सएप पर प्रत्याशी नामांकन भरते हैं, और सत्ता पक्ष के नेता निर्विरोध चुने जाते हैं। हम ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कुछ नहीं हुआ और अगले चुनाव की ओर बढ़ जाते हैं।
अशोक के उदास मुख और फैली हुई आँखों को देख मित्र ने समझाया- देखो भाई, यह चुनावी हिंसा की व्यवस्था को स्वीकार्यता ही है जो आप अस्त्र शस्त्र लिए घूम रहे हैं। पुलिस भी आप पर पीएफआई कार्यकर्ता समझ कर हाथ नहीं धर रही है, क्योंकि आपका दल सत्ताधारी दल को चुनाव को समर्थन दे रहा है।
अशोक बोले- यह पीएफआई क्या कोई सेना है?
मित्र खिन्न हुए- अब कर्नाटक में हो तो ऐसा नाटक करना आवश्यक नहीं है। तुम पीएफआई वाले नहीं हो तो कमर में तलवार टाँगे अहिंसा की बात क्यों कर रहे हो?
अशोक को लोकतंत्र के सब विरोधाभास बड़े विचित्र लग रहे थे। मित्र का रोष टाल कर बोले - मित्र, तो क्या राजा के पुत्र के राजा होने की परंपरा लोकतंत्र में समाप्त हो गई है?
मित्र अशोक के अज्ञान पर अचम्भित होते हुए बोले- नहीं, चलता तो वैसे ही है पर जनता को भ्रम में रखा जाता है कि अब वह व्यवस्था नहीं है। काँग्रेस के युवराज तो विदेशों में भी कह आए कि भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से उत्तराधिकार के सिद्धांत पर चलता है।
अशोक बोले- किंतु यह तो सत्य नहीं है। अन्यथा चंद्रगुप्त कैसे शासक बन पाते?

मित्र लंबी साँस भर कर बोले- हे भोले मित्र, लोकतंत्र में वही सत्य है जो सिक्कों की थैली में छप कर संपादकीय में स्थान पाता है। युवराज की उस भाषण पर भारी प्रशंसा हुई, आपत्ति लेने वाले हम-आप कौन हैं?
अशोक अपने नए मित्र से बोले- मित्र, आप तो बड़े ज्ञानी जान पड़ते हैं। आप प्रत्याशी क्यों नहीं बनते?

मित्र बोले- देखो भाई, हम आए है उत्तर भारत से, हमारा काम है यहाँ पुल, सड़क मेट्रो बनाना, चुनाव लड़ना नहीं। वो भी यहाँ, उत्तरभारतीय हो कर? तुम ख़ुद भी पिटोगे, हमें भी पिटवाओगे।
अशोक सिर खुजाने लगे- किन्तु हमने तो अपने शासनकाल में ही भारत को एक कर दिया था। ये उत्तर-दक्षिण क्या है? हम भी तो मगध से आए थे, और सबको भारतवर्ष ही मान कर चले। हमारा पुत्र महेंद्र तो श्रीलंका तक गया था, धर्म प्रचार के लिए।
मित्र बोले- देखिए, महेंदर बाबू क्या किए फारेन जा कर सो अलग बात है। विदेश जा कर तो भारतीय एक होते ही हैं, पर यहाँ कोई प्राउड तमिल, कोई प्राउड कन्नाडिगा तो कोई प्राउड मराठा होता है। और मगध का तो छोड़ दीजिए वहाँ तो एक राज्य में ही प्राउड यादव, प्राउड भुमिहार और प्राउड कायस्थ होता है
हमारी छोड़िए, आप ही चुनाव लड़ लें। आप के पास धन भी है, तलवार भी।

अशोक बोले- हम भी सोच रहे हैं। घोषणापत्र में क्या डालें, प्रगति तो देश में बहुत हो गई है।
हमारे समय इस स्थान, जिसे बेंगलूरू कहते हैं से, मैसूर पहुँचने में आधा दिन लगता था। महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी थी, किसान भूखा था, सो हमने जब शासन किया, सब बहुत प्रसन्न हुए। पर अब तो सब बदल गया होगा? अब जनता को क्या देने का वादा करें ?
देखिए, कर्नाटक विजय के समय ये सब कवर किया हो, विषय वही हैं। बेंगलूरू से मैसूर जाने के बराबर समय आज भी इलेक्ट्रानिक सिटी से येलाहाँका जाने में लगता, महिलाएँ नव वर्ष पर बाहर नहीं जाती हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। चुनावी विषयों में विंध्य विभाजन नया कोण है, बाक़ी पुराना ही है।
समस्या अलग है, कि आप किस वोट बैंक में फ़िट होंगे। कुछ रूक कर मित्र बोले।
आप बौद्ध हो गए थे, दलित राजनीति में फ़िट हो सकते हैं। पर वहाँ पहले ही भीड़ है। हिंदूवादी राजनीति में आप बैठेंगे नहीं, आप हिन्दू नहीं हैं।
सम्राट उत्तेजित हो गए- ऐसा क्यों कहते हैं? हम बौद्ध हिंदू हैं।
मित्र बोले- देखिए, आज भारत में बौद्ध हिंदू नहीं, जैन हिंदू नही, भगवान ने चाहा तो कल लिंगायत भी हिंदू न होंगे। काँग्रेस की चली तो भविष्य में भारत में राहुल जी के सिवा कोई हिंदू न होगा और काँग्रेस के युवराज अकेले होली पर ग़ुब्बारे फेंका करेंगे। आपका पूरा नाम क्या है?
अशोक- सम्राट
अशोक- सम्राट बोले

अरे भाई, पूरा नाम बताइए।

अशोक महान।

ये महान किस जाति में आते हैं। अगड़े हैं कि पिछड़े? आप अपने समय पर गड़बड़ कर गए।
गर्वित मागध का कोई आँदोलन नहीं चलाया, ना कर्नाटक वालों को अपने शासन में मगही सिखाई। भाषा विवाद में आपकी स्थिति गड़बड़ है, उत्तरभारतीय भी हैं, आपकी धार्मिक स्थिति जैसे सोशल मीडिया में कहते हैं - काम्प्लिकेटड - है। आप चुनाव का विचार छोड़ दें।
लोकतांत्रिक राजनीति आपकी थाली की खिचड़ी नहीं है। आप दर्शक बन कर आनंद लें।- मित्र बोले

ये सुन कर अशोक मानव रूप त्याग कर पुन: अंतर्ध्यान हो गए। 🙏🙏

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